मातृभाषा विषय पर एक आवाज़

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस , 21 फरवरी को Facebook पर अपने एक मित्र का video पोस्ट मैंने देखा | उसने video के माध्यम से मातृभाषा विषय पर आवाज़ उठाने का सराहनीय प्रयास किया है | अभी हाल ही में किसी अंग्रेजी अखबार में छपे एक लेख में भारत में विलुप्त होती भाषाओं और बोलियों का विषय मुझे चिंतित करता है | और फिर उसके  इस विडियो ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इस बदलाव की वजह क्या हो सकती है |

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आज आम जिंदगी में टीवी, मोबाइल और लैपटॉप का विस्तृत प्रयोग एक अहम भूमिका अदा करता है | इसे देखने – समझने का माध्यम क्या है – अंग्रेजी या हिंदी| बचपन, वह उम्र जब इंसान में कोई नई चीज़ सीखने की सबसे अधिक संभावना होती है, आज की दौर में हमे सबसे अधिक अनावरण अंग्रेजी या हिंदी की मिलती है | आज 7-8  वर्ष का मनोहर भी smartphone पर अंग्रेजी में चलने वाले apps को बड़े आसानी से चला पता है | स्कूल- कॉलेजों में शिक्षा का माध्यम क्या है – अंग्रेजी, हिंदी या फिर कोई प्रमुख क्षेत्रीय भाषा | पर ऐसी भाषाओं और बोलियों का क्या जिनको बोलने-समझने वालों की संख्या करोड़ो में नहीं तो कम से कम लाखों – हजारों में तो है | इनकी विकास- गति कुछ रुक सी गयी है | गाँव में फर्राटे से मगही बोलने वाली गौरी जब बड़े शहर की होती है तो अब अंग्रेजी को ही cool समझती है, घर वालों से भी बातें अब हिंदी में होने लगी है | त्याहारों वालीं- ब्याहों वालीं, अपनी मिट्टी की लोक-गीतें केवल पिछली पीढ़ी के माताओं – बुओं को याद रह गयी हैं | वो मुहावरे, कथा-कहानियाँ जो मोहल्ले के चाचा-ताऊ से सुनने मिलती थीं, वो smart होती शहरों के शोर में सन्नाटा बन चुकी हैं | किसी भी क्षेत्रीय इलाके में आज विभिन्न समाज बसतीं हैं | भारतीय समाज बहोत ही तेज़ी से nucleated (एकल परिवार) होता जा रहा है | भाषा, बोली या कह लो की संस्कृति का  विकास संभव है मिलन से- सार से , उसके उत्सव से |

Number_of_Native_Speakers_of_Indian_Languages_world

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अन्य प्रमुख कारण है नई साहित्यों की कमी और पुरानों का सीमित सीमा और पहुँच | आज कितने ही गिने- चुने लेखक हैं जो क्षेत्रीय भाषाओँ में अपनी कला की प्रस्तुति करते हैं | नई पीढ़ी इस राह पर मुझे थोड़ी पीछे दिखाई पढती है | गलती हमारे शिक्षा व्यवस्था की भी है , जहाँ mainstream syllbus से आगे हम बढ़ ही नहीं पाते हैं | क्यों संस्कृत जो अनेक भाषाओँ की जननी भी है , उसे कक्षा 4 या 5 से केवल 3-4 वर्षों तक ही पढाया जाता है , क्यों उर्दू की अज्ञानता हमे सूफी- संस्कृति से रूबरू नहीं होने देती | खैर इन मुद्दों पर बहोत कुछ और लिखा जा सकता है | अंत में यही कहूँगा कि विविधता ही भारत की प्रमुख विशेषता है | इस आभूषण को संभालना अपना कर्त्तव्य है |

जय हिन्द |

Aman

Arivaan is a collection of thoughts that pertain within and get converted into writings. The word Arivaan itself is a creation of my imagination. If I think of giving a meaning to it then most appropriate would be imaginations turning reality.

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